Friday, October 22, 2010

ऐ- मौला ये कैसी आंधी चलाते हो,क्यों इनसान को इनसान का दुश्मन बनाते हो,बहते है खून के दरिए,और मौत तांडव करती है,एेसी अनहोनियां देखकरइन्सानियत देखकर,कभी टकराते है जहाज दीवारों से,और कभी उड़ान में फट जाते है,फिर भी इन्सानियत के दुश्मन,खुलेआम कहर ढाते है,मंदिरों, मस्जिदों पर हमलें,आज आम नजर आते है,दहशत गरदों के मनसूबे,हर दिल को दहलाते है,अगर पकड़ो इन जालिमों को,तो ये मासूमों को बंदी बनाते है,जो न हो रास्ता छूटने का कोई,तो ये अपनी ही सुरंग बनाते है, जब होती है कोई घटना,तब सारे राजनीतिज्ञ आते है,सरकार चलाने वाले इसे,पड़ोसी मुल्क की हरकत बताते है,और विरोधी पार्टी वाले, सरकार को निशाना बनाते है,कब होगा खत्म ये सिलसिला,कब आएगी खुशहाली,एे मौला कर रहमत,बना दे अंधेरी रात को दिवाली।।